Wednesday, 18 December 2019

92 साल की उम्र में हुआ इस एक्टर का निधन, आखिरी वक्त में दिखने लगे थे ऐसे

दिग्गज एक्टर श्रीराम लागू का पुणे में 92 साल की उम्र में निधन हो गया. उनका अंतिम संस्कार गुरुवार को किया जाएगा. श्रीराम लागू ने अपने फिल्मी करियर में सैकड़ों हिंदी और 40 से ज्यादा मराठी फिल्मों में काम किया है. श्रीराम लागू ने वो आहट: एक अजीब कहानी, पिंजरा, मेरे साथ चल, सामना, दौलत जैसी कई फिल्मों में काम किया है. आइए जानते हैं उनके करियर और निजी जिंदगी के बारे में.
चुनौतीपूर्ण भूमिका.
साल 1980 में प्रदर्शित बीआर चोपड़ा निर्देशित फिल्म इंसाफ का तराजू में सबसे चुनौतीपूर्ण भूमिका डाक्टर श्रीराम लागू के हिस्से में आई थी. इस फिल्म में वे ज़ीनत अमान और पद्मिनी कोल्हापुरे के बलात्कार के आरोपी राज बब्बर के वकील थे. इंसाफ का तराजू 80 के दशक की सर्वाधिक चर्चित और हिट फिल्मों में से एक थी क्योंकि बलात्कार पर इससे पहले कोई फिल्म ऐसी नहीं बनी थी जो समाज में हलचल मचाते उसे इस संवेदनशील मुद्दे पर नए सिरे और तरीके से सोचने मजबूर कर दे.
कारोबारी राज बब्बर 2 बहनों का बलात्कार करता है और उसे बचाने का जिम्मा लेते हैं क्रिमनल लायर मिस्टर चंद्रा यानि श्रीराम लागू. इस फिल्म के अदालती दृश्य काफी वास्तविक और प्रभावी बन पड़े थेजिरह में बचाव पक्ष का वकील कैसे-कैसे घटिया और बेहूदे सवाल पीड़िता से पूछता है. यह श्रीराम लागू ने पर्दे पर जितने प्रभावी ढंग से उकेरा, वह शायद ही कोई दूसरा कलाकार कर पाता. कटघरे में खड़ी ज़ीनत अमान से यह पूछना कि बलात्कार के वक्त आरोपी के हाथ उस वक्त कहां थे, कंधों पर या जांघों पर और आपने अपने बचाव में क्या-क्या किया जैसे दर्जनों सवाल अदालतों का वीभत्स और कड़वा सच तब भी था और आज भी है. फिल्म में ज़ीनत अमान की दयनीयता पर श्रीराम लागू की क्रूरता भारी पड़ी थी. अलावा इसके इस फिल्म का यह डायलाग भी खूब चर्चित हुआ था कि अगर कोई चश्मदीद गवाह होता तो बलात्कार होता ही क्यों.
पेशे से ईएनटी सर्जन थे श्री राम लागू.
खैर यह हिन्दी फिल्म थी, इसलिए अंत सुखद ही हुआ लेकिन श्रीराम लागू ने अपने किरदार को जिस तरह से अंजाम दिया वही उनकी खूबी थी, जिसके लिए वे आज तक याद किए जाते हैं और आगे भी याद किए जाएंगे. 80 से भी ज्यादा हिन्दी फिल्मों में विभिन्न शेड्स में अभिनय करने वाले श्रीराम लागू पेशे से ईएनटी सर्जन थे और मराठी थियेटर का जाना माना नाम थे. मामूली शक्ल सूरत वाले श्रीराम लागू की एक्टिंग की अपनी एक अलग स्टाइल थी जिसे बदलने की कोशिश उन्होने कभी नहीं की. ठीक वैसे ही जैसे दूसरे उन सरीखे कई चरित्र अभिनेताओं ने नहीं की. इनमें खास नाम इफ़्तिखार, जगदीश राज, ओम प्रकाश, असित सेन, केष्टो मुखर्जी, उत्पल दत्त और एके हंगल के हैं. ये तमाम कलाकार चार दशकों तक एक से ही नजर आए और हर भूमिका में दर्शकों ने उन्हें हाथों हाथ भी लिया.
महाराष्ट्र के सतारा में जन्मे 92 वर्षीय श्रीराम लागू ने पढ़ाई पुणे और मुंबई से की औए ईएनटी सर्जन बनने के बाद प्रेक्टिस करने लगे . कालेज के दिनों में उन्होने स्टेज पर एक्टिंग की जो सराही भी गई . थियेटर तो उनकी सांस था . कुछ साल बतौर डाक्टर वे दक्षिण अफ्रीका में भी वे रहे लेकिन जब भारत वापस आए तो बचपन से मन में दबी कुचली इस ख़्वाहिश को और ज्यादा नहीं टरका पाये कि फिल्मों में काम किया जाये जिस पर उनके माता पिता कभी राजी नहीं हुये थे .

42 साल की उम्र में बने एक्टर.
इस वक्त श्रीराम लागू की उम्र 42 साल थी , जाहिर है इस अधेड़वास्था में उन्हें कोई हीरो बाले रोल तो मिलते नहीं लिहाजा वे खामोशी से चरित्र अभिनेता बन गए . गंभीरता और परिपक्वता उनके चेहरे पर हमेशा पसरी रहती थी जिसके चलते वे दूसरे कलाकारों से अलग हटकर दिखते थे . शायद डाक्टरी के पेशे ने उन्हें ऐसा बना दिया था . हालांकि फिल्मों में काम हासिल करने उन्हें कोई स्ट्रगल नहीं करना पड़ा लेकिन बतौर चरित्र अभिनेता उन्हें पहचान साल 1977 में प्रदर्शित फिल्म घरौंदा से मिली . गुलजार की लिखी इस कहानी में बढ़ते शहरीकरण के साइड इफेक्ट और बिल्डर्स की ठगी और बेइमानिया दर्शाई गईं थीं . अमोल पालेकर और ज़रीना बहाव प्यार करते हैं लेकिन मुंबई में उनके पास घर नहीं है इस कशमकश को बेहद खूबसूरत तरीके से निर्देशक भीमसेन ने घरौंदा में दिखाया गया था .
मिला बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्म फेयर पुरुस्कार.
एक घर हासिल करने ज़रीना बहाव अमोल पालेकर के कहने पर अपने बूढ़े लेकिन रईस बॉस मिस्टर मोदी यानि श्रीराम लागू से शादी कर लेती है लेकिन शादी के बाद उसके भारतीय संस्कार उसे पति को धोखा देने से रोकते हैं और वह उससे ही प्यार करने लगती है . अमोल पालेकर बेचारा हाथ मलता रह जाता है . फिल्म का गाना , दो दीवाने शहर में रात में और दोपहर में आशियाना ढूंढते हैं .. खूब बजा था और आज भी शिद्दत से सुना और गुनगुनाया जाता है . इस फिल्म के आखिरी दृश्य में श्रीराम लागू को हार्ट अटेक आता है जिसे उन्होने इतने जीवंत तरीके से जिया था कि हाल में बैठे दर्शकों को वे सचमुच में मरते से लगे थे फिल्म समीक्षकों ने इस दृश्य को जबरजस्त करार दिया था . मिस्टर मोदी के किरदार के बाबत श्रीराम लागू को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्म फेयर पुरुस्कार भी मिला था .
लावारिश का गंगू गनपत.
घरौंदा की जबरजस्त कामयाबी के बाद भी उन्हें उल्लेखनीय रोल नहीं मिले लेकिन कई भूमिकाओं को उन्होने अपने अभिनय के दम पर उल्लेखनीय बना दिया . इन में से एक है प्रकाश मेहरा निर्देशित और अमिताभ बच्चन अभिनीत 1981 में प्रदर्शित फिल्म लावारिस जिसने बॉक्स ऑफिस पर हाहाकार मचा दिया था . लावारिस फिल्म में श्रीराम लागू की भूमिका दूसरे कलाकारों के मुक़ाबले काफी छोटी थी . वे लावारिस हीरो के पिता बने थे जो दिन रात शराब के नशे में धुत अपने सौतेले बेटे को गलियाँ देता रहता है .
गंगू गनपत का यह किरदार अनूठा था जिसमें में वह बार बार हरामी , कुत्ता और नाली के कीड़े जैसी गालियां एक खास अंदाज में बका करता है . तब अमिताभ बच्चन का केरियर और शोहरत दोनों शबाब पर थे पर श्रीराम लागू गंगू गनपत को जीते उनके सामने बिलकुल नहीं लड़खड़ाये थे . इस फिल्म के डायलोग कादर खान ने लिखे थे जिनहोने पहली बार नाजायज औलाद की जगह नाजायज बाप शब्द का प्रयोग किया था . इस छोटी सी भूमिका में श्रीराम लागू ने जान डाल दी थी और हैरत की बात यह है कि व्यक्तिगत जीवन में वे शराब और सिगरेट जैसे नशे से परहेज करते थे .
फिर 2 साल बाद आई निदेशक सावन कुमार टाक की फिल्म सौतन जिसके संवाद जाने माने साहित्यकार कमलेश्वर ने लिखे थे . राजेश खन्ना , टीना मुनीम , पद्मिनी कोल्हापुरे , प्रेम चोपड़ा और प्राण सरीखे नामी सितारों के सामने उनके पास करने कुछ खास नहीं दिख रहा था . लेकिन फिल्म के प्रदर्शन के बाद दर्शकों और फिल्मी पंडितों ने एक सुर में माना था कि श्रीराम लागू ने गोपाल के किरदार में अपनी प्रतिभा से जान डाल दी है . इस फिल्म में वे पदिमिनी कोल्हापुरे के पिता बने थे . दरअसल में यह भूमिका ऐसे अधेड़ गरीब दलित की थी जिसकी परित्यक्ता बेटी पर चारित्रिक लांछन रईसों ने लगा रखा है . एक दयनीय दलित पिता के इस रोल को दर्शकों ने खूब सराहा था तो तय है इसलिए कि यह पात्र और श्रीराम लागू का अभिनय दोनों वास्तविकता के काफी नजदीक थे .

विलेन भी बने.
दूसरी कई फिल्मों में वे छोटी मोटी भूमिकाओं में दिखे लेकिन अधिकांश में उन्हें अभिनय प्रतिभा दिखाने का मौका नहीं मिला और इसका अफसोस भी उन्हें कभी नहीं रहा .1982 में सुभाष घई की फिल्म विधाता में वे खलनायक बने थे पर दर्शकों ने उन्हें इस रूप में ज्यादा पसंद नहीं किया था . हालांकि हास्य को छोड़कर तमाम भूमिकाएँ उन्होने बेहद सहज तरीके से निभाईं इसीलिए वे एक सहज कलाकार फिल्म इंडस्ट्री में माने जाते थे जो आमतौर पर पब्लिसिटी से दूर ही रहता था . 90 के दशक में वे हिन्दी फिल्मों में न के बराबर दिखे और जिनमे दिखे वे सब की सब सी ग्रेड की फिल्में थीं .
मराठी थियेटर और सिनेमा से मिली पहचान.
हिन्दी फिल्मों से ज्यादा पहचान उन्हें मराठी थियेटर और सिनेमा से मिली पिंजरा , सिंहासन और सामना उनकी यादगार मराठी फिल्में हैं . नट सम्राट वह पहला नाटक है जिसकी भूमिका के लिए वे हमेशा याद किए जाते रहेंगे . इस के लेखक विष्णु वामन शिरवाडकर को साहित्य अकादमी पुरुस्कार मिला था . इस नाटक में श्रीराम लागू ने गणपत बेलवलकर की भूमिका निभाई है जिसे मराठी थियेटर में मील का पत्थर माना जाता है . इस नाटक से ताल्लुक रखती दिलचस्प बात यह किवदंती है कि गणपतबेलवलकर का रोल इतना कठिन है कि जिस किसी कलाकार ने भी इसे निभाना चाहा वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गया . खुद श्रीराम लागू भी इस रोल को करने के बाद हार्ट अटेक की गिरफ्त में आ गए थे . शायद इसीलिए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने उन्हें श्रद्धांजलि देते नट सम्राट ही कहा .
नाम और पैसा तो खूब मिला लेकिन नहीं मिली पहचान.
लगता ऐसा है कि व्यावसायिक सिनेमा के फेर में पड़कर वे थियेटर से दूर होते चले गए हालांकि इस बात को उन्होने एक इंटरव्यू में बेमन से नकारा था लेकिन अपनी आत्म कथा लमन जिसका मतलब माल ढोने बाला होता है में उनका यह दर्द झलका था . समाजसेवी अन्ना हज़ारे से वे खासे प्रभावित थे और कुछ वक्त वहैसियत सामाजिक कार्यकर्ता भी उन्होने गुजारा लेकिन उल्लेखनीय कुछ नहीं कर सके . उनकी पत्नी दीपा भी नामी कलाकार रहीं हैं . हिन्दी फिल्मों से श्रीराम लागू को नाम और पैसा तो खूब मिला लेकिन वह पहचान नहीं मिल पाई जिसके कि वे हकदार थे और ज़िंदगी भर उसके लिए बैचेन भी रहे . शायद ऐसे ही मौकों के लिए मशहूर शायर निदा फाजली ने यह गजल गढ़ी होगी कि - कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता ..