Monday, 16 March 2020

निर्भया केस: दोषियों के परिजनों की इच्‍छा-मृत्यु की मांग क्या मानी जाएगी, जानें क्या है नियम


बेंगलुरु। दिल्ली के निर्भया गैंगरेप और मर्डर केस में 20 मार्च को चारों दरिंदों को फांसी पर लटकाया जाएगा। लेकिन उनके परिजनों ने अब राष्‍ट्रपति को चिट्ठी लिखकर अपने लिए इच्‍छा मृत्यु की मांग की हैं। इसके लिए दोषियों के परिजनों में से 13 लोगों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा है।
बता दें निर्भया के दोषी फांसी की सजा से बचने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते रहे हैं। कुछ ऐसी ही चाल अब उनके परिजनों ने चली है। मालूम हो कि इच्छा मृत्यु की मांग करने वालों में दोषी मुकेश के परिवार के दो लोग, दोषी पवन और विनय के परिवार के चार-चार लोगों ने और दोषी अक्षय के परिवार के तीन सदस्‍यों ने इच्छा मृत्यु की मांग की है। ऐसे में सवाल उठता हैं कि क्या परिजनों के द्वारा की जा रही मांग क्या वाजिब हैं? आइए जानते हैं भारत में इच्‍छा मृत्यु को लेकर क्या नियम हैं क्या कहता हैं भारत का कानून?
लेटर में लिखी ये बात
परिजनों ने चिट्ठी में लिखी है ये बात
पहले बता दें इच्छा मृत्यु की मांग के इस पत्र में उन्‍होंने लिखा है 'हम आपसे (राष्ट्रपति) और पीड़िता के माता-पिता से इच्छा मृत्यु के हमारे अनुरोध को स्वीकार करने की अपील करते हैं ताकि भविष्य में होने वाले किसी भी अपराध को रोका जा सके। इसमें आगे कहा गया है कि इसके बाद अदालतों को एक की जगह पर पांच लोगों को फांसी नहीं देनी होगी। इस पत्र में कहा गया है, 'कोई पाप नहीं है जिसे माफ नहीं किया जा सकता है। हमारे देश में, यहां तक ​​कि एक महापापी को भी माफ कर दिया जाता है।'

क्या होती हैं इच्‍छा मृत्यु
मेडिकल साइंस में इच्छा-मृत्यु यानी यूथेनेशिया को किसी की मदद से आत्महत्या और सहज मृत्यु या बिना कष्ट के मरने के व्यापक अर्थ हैं। क्लिनिकल दशाओं के मुताबिक़ इसे परिभाषित किया जाता है। किसी लाइलाज और पीड़ादायक बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को निष्क्रिय रूप से इच्छामृत्यु दी जाती है। इसका मतलब यह है कि पीड़ित व्यक्ति के जीवनरक्षक उपायों (दवाई, डायलसिस और वेंटिलेशन) को बंद कर दिया जाएगा अथवा रोक दिया जाएगा। पीड़ित स्वयं मृत्यु को प्राप्त होगा। मरीज़ की मंज़ूरी के बाद जानबूझकर ऐसी दवाइयां देना जिससे मरीज़ की मौत हो जाए। इच्‍छा मृत्यु भी दो प्रकार की होती है पैसिव और ऐक्टिव इच्छामृत्यु ऐक्टिव इच्छामृत्यु का अर्थ होता है इंजेक्शन या किसी अन्य माध्यम से पीड़ित को मृत्यु देना।

भारत में इच्‍छा मृत्यु को लेकर ये है नियम
भारत में इच्‍छा मृत्यु को लेकर क्या है निय
बता दें भारत में पहले किसी भी हालत में इच्‍छा मृत्यु की अनुमति नहीं थी हमारे संविधान की कुछ धाराएं इसकी अनुमति नहीं देती थी। जिस कारण भारत में लंबे समय इस पर चर्चा होती रही। लेकिन मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने 'निष्क्रिय इच्छामृत्यु' और 'लिविंग विल' को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दे दी हैं। कोर्ट ने संविधान पीठ ने गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया था। जिसमें उसने कहा था कि मरणासन्न व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि कब वह आखिरी सांस ले।

कानून बनने तक प्रभावी रहेंगे
कानून बनने तक प्रभावी रहेंगे कोर्ट के निर्देश
शीर्ष अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में असाध्य रोग से ग्रस्त मरीजों की स्वेच्छा से मृत्यु के चुनाव की वसीयत को मान्यता दी थी और साथ ही सरकार को इस संबंध में कानून बनाने का निर्देश दिया था। साथ ही कुछ दिशानिर्देश दिए थे जो इस संबंध में कानून बनने तक प्रभावी रहेंगे। कोर्ट ने कहा कि लोगों को सम्मान से मरने का पूरा हक है। लिविंग विल' एक लिखित दस्तावेज होता है जिसमें कोई मरीज पहले से यह निर्देश देता है कि मरणासन्न स्थिति में पहुंचने या रजामंदी नहीं दे पाने की स्थिति में पहुंचने पर उसे किस तरह का इलाज दिया जाए। पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) वह स्थिति है जब किसी मरणासन्न व्यक्ति के जीवनरक्षक सपोर्ट को रोक अथवा बंद कर दिया जाय।

सुप्रीम कोर्ट ने केवल पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी है
हालांकि 'लिविंग विल' अर्थात मौत की वसीयत पर कुछ लोगों ने आशंका जताई है कि इसका दुरुपयोग भी किया जा सकता है। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी है, ऐक्टिव की नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने किसी ऐसे विशेष रोग का उल्लेख नहीं किया है. अगर डॉक्टर्स को लगता है कि पीड़ित के स्वस्थ होने की कोई आस नहीं बची है तो उसके परिवार वालों से सलाह करके निष्क्रिय इच्छामृत्यु दी जा सकती है।

राष्‍ट्रपति क्या सुनेगे परिजनों की ये मांग
राष्‍ट्रपति क्या सुनेगे परिजनों की ये मांग
ऐसे में साफ हो चुका हैं निर्भया के चारों दोषियों ने राष्‍ट्रपति को जो अपने लिए जो इच्‍छा मृत्यु की मांग की है उसका भारत में उसको लेकर कोई प्रवधान ही नही हैं। ये पत्र सिर्फ चारों दरिंदों की फांसी टलवाने को लेकर हैं। राष्‍ट्रपति इस मांग को सिरे से खारिज कर देंगे क्योंकि दोषियों के परिजन जिन्‍होंने ये मांग की है उनमें से कोई भी मरणासन जैसी स्थिति में नही है।